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स्वतंत्रता दिवस पर 'देश प्रेम और राष्ट्र निर्माण' के विषय पर भाषण

स्वतंत्रता दिवस पर ‘देश प्रेम और राष्ट्र निर्माण’ के विषय पर भाषण

स्वतंत्रता दिवस पर ‘देश प्रेम और राष्ट्र निर्माण’ के विषय पर भाषण

यह सबसे प्रसिद्ध और सबसे ज्यादा दिया जाने वाला भाषण है –

शायरी 

हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं,

हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं,

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं, हिंदुस्तान कहते हैं।

जो दुनिया में सुनाई दे उसे कहते हैं खामोशी,

जो आंखों में दिखाई दे उसे तूफान कहते हैं।

जो यह दीवार का सुराख है साहब, जो यह दीवार का सुराख है

चाइना, अमेरिका, पाकिस्तान साजिशों का हिस्सा है

मगर हम इसे अपने घर का रोशन दान कहते हैं, अपने घर का रोशन दान कहते हैं।

संबोधन 

परम सम्माननीय निर्णायक मंडल के सदस्यों, सभा में उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्ति, मैं ( नाम ), देश प्रेम और राष्ट्र निर्माण के उपलक्ष पर अपने कुछ विचार आप सभी के साथ साझा करना चाहूँगा /चाहूंगी।

शुरुआत 

आजादी… आजादी का असली मतलब वही समझ सकता है जिसने कभी गुलामी की हो। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने स्वतंत्र भारत में जन्म लिया। यूं तो आजादी की लौ 1857 में ही जल चुकी थी जो मशाल बनकर 1947 में हमारे देश को आजाद कराई। प्राचीन, मध्यकालीन और वर्तमान भारत के उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहूंगी कि जब हम फिरंगियों के गुलाम थे तो ‘रंग दे बसंती चोला’ की एक आवाज पर टोलों के टोले उमड़ आते थे और उनके ‘वंदे मातरम’ के नारों से खून में आने वाला पांच-पांच डिग्री का तूफान अंग्रेजी शासकों की जड़ों में तूफान ला देता था।

लोग मर जाते थे, मिट जाते थे, फांसी चढ़ जाते थे, तो वो भी अपनी देशभक्ति साबित कर रहे होते थे क्योंकि यह उस दौर की देशभक्ति की कसौटी थी। उसके बाद 62, 65 और 71 के युद्धों में अपना सुहाग गवा देने वाली औरत… जब घर के हालात यह हो जाया करते थे(शायरी जैसा बोले)- कि प्यार भी भरपूर गया, मांग का सिंदूर गया, नन्हे नौनिहालों की लंगोटिया चली गई, छोटी-छोटी बेटियों की चोटियां चली गई, बाप की कमाई गई, भाई की पढ़ाई गई, ऐसा एक विस्फोट हुआ पता ही चला नहीं पूरे जिस्म की ही कई बोटिया चली गई! और आपके लिए तो एक आदमी मरा है साहब, किंतु मेरे घर की तो रोटियां चली गई, मेरे घर की तो रोटियां चली गई! वाले हालात पैदा हो जाने के बावजूद भी एक मां अपने बेटे को सरहद पर दुश्मनों की धज्जियां उड़ाने के लिए भेज देती थी। और उसे पत्र लिखाकर ये भेजा करती थी कि, ‘अम्मा ने खत लिखा है बड़े ही चाव से, पुत्र मेरे ना घबरा जाना, एक इंच भी पीछे ना हटना चाहे इंच-इंच कट जाना, चाहे इंच-इंच कट जाना।’

इस तरह पूरा परिवार अपनी देशभक्ति साबित कर रहा होता था। तब देश बलिदान मांगता था, तब देश लड़ जाने को कहता था, तब देश मर जाने को, मिट जाने को, फांसी चढ़ जाने को कहता था। किंतु आज… आज देश लड़ जाने को नहीं कहता, आज देश मर जाने को, मिट जाने को, फांसी चढ़ जाने को नहीं कहता, बल्कि मेरे विचारों में यदि कोई व्यक्ति अपना काम पूरी ईमानदारी, पूरी मेहनत और पूरी लगन से करे ना, तो वही सबसे बड़ा देशभक्त है।

मुख्य बातें 

मैं नहीं मानती कि facebook या WhatsApp की DP पर तिरंगा लगा लेना देशभक्ति है। यदि साल में दो बार हाथ में तिरंगा ले लेना देशभक्ति है, तो मैं पूछना चाहूंगी कि फुटपाथ में रहने वाला वह बच्चा, ट्रैफिक की छाव में नंगे पांव में जब तिरंगा बेच रहा होता है तो क्या इसे आप उसकी देशभक्ति कहेंगे? यह उसकी देशभक्ति नहीं उसके पेट के भूख की शक्ति है जो उसे ऐसा करने पर मजबूर करती है। क्योंकि ना मस्जिद को जानते हैं, ना शिवालों को जानते हैं… ना मस्जिद को जानते हैं, ना शिवालों को जानते हैं, जो पेट के भूखे होते हैं ना वो सिर्फ भोजन के निवालों को जानते हैं, वो सिर्फ भोजन के निवालों को जानते हैं।

अपने परिवार, अपने समाज, अपने देश के लिए समर्पण का भाव है देशभक्ति। और हर देशद्रोही के जीवन में आने वाला तूफान है हमारी सच्ची देशभक्ति। ताकि हर देशद्रोही ये समझ सके कि अगर तू परिंदा है तो यह आसमान तेरा है, अगर तू दरिंदा है तो यह शमशान तेरा है, भाईचारे से रहना है तो रह इस जमीन पर वरना यह कब्र भी तेरी है और यही कब्रिस्तान तेरा है।

लेकिन एक देशद्रोही से ज्यादा देशभक्ति तब आहत होती है जब एक बेटा अपने बूढ़े मां-बाप को वृद्धाश्रम की चौखट पर छोड़ आता है। कराह उठती है वो देशभक्ति जब मुसीबत में फंसे लोगों की जान बचाने से ज्यादा हम सेल्फी लेकर अपने लाइक बढ़ाने में लगे रहते हैं। आज के इस दौर में वो युवा जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी अपने देश, अपने समाज, अपने राष्ट्र की आशाओं को बांधे रखने की, वही युवा अब 4/4 इंच की छोटी सी स्क्रीन पर अपनी कोमल अंगुलियों के घर्षण मात्र से अपनी भावनाओं की इमोजी भेज रहा है। ‘चार बोतल वोडका काम मेरा रोज का’ ने भारत का भविष्य तबाह कर रखा है।

हम ना एक ऐसे समाज में जीते हैं जहां लड़कों से बात करता देख जो भाई हड़काते हैं, लड़कों से बात करता देख जो भाई हड़काते हैं, वही भाई अपनी गर्लफ्रेंड के किस्से घर में हंस-हंस कर सुनाते हैं। और मैं बता दूं महिला सुरक्षा के मामले में हम आज भी चौथे नंबर पर आते हैं। हम ना एक ऐसे समाज में जीते हैं जहां पत्थर की मूरत को लगते हैं छप्पन भोग और भूखे नंगे तड़पते सो जाते हैं लोग, भूखे नंगे तड़पते सो जाते हैं लोग। मजदूर को मजदूर समझिए मजबूर नहीं, गरीब को काम दीजिए दान नहीं। और अगर दान देने के इच्छुक हैं तो जीते जी रक्त दान दीजिए और मरने के बाद अंग दान देकर किसी मरते हुए को जीवन दान दीजिए। यही सच्ची देशभक्ति और यही सच्चा राष्ट्र प्रेम है।

Quotes

ना सरकार मेरी है, ना रब मेरा है, ना सरकार मेरी है, ना रब मेरा है, और ना ही यह बड़ा सा नाम मेरा है, बस इतनी सी बात का गुरूर है मुझे कि मैं भारत की हूं और यह भारत मेरा है, और यह भारत मेरा है।

परंतु एक वैचारिक बीमारी हमारे समाज में मुझे नजर आती है। कहा जाता है हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं जहां हिंदू पैदा होते हैं, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी पैदा होते हैं, लेकिन बदकिस्मती है अब इंसान पैदा नहीं होते। और मेरे विचारों में ना हिंदू की जरूरत है ना मुसलमान की जरूरत है, राष्ट्र निर्माण के लिए केवल अच्छे इंसान की जरूरत है, केवल अच्छे इंसान की जरूरत है। जरा सोच कर देखिए यह पेड़-पौधे और शाखाएं भी परेशान हो जाएं अगर परिंदे भी हिंदू और मुसलमान हो जाएं।

एक शैक्षणिक बीमारी भी हमारे समाज में मुझे नजर आती है और बड़े ही आश्चर्य की बात है जिस देश ने पूरी दुनिया को तक्षशिला और नालंदा देकर के विश्वविद्यालय शिक्षा की बुनियाद रखी, आज विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में हमारा एक भी विश्वविद्यालय खड़ा नहीं हो पाता। जहां एक ओर हमारे पास IIT, IIM और NIT जैसे शिक्षण संस्थान हैं तो वहीं दूसरी ओर इस देश के गरीबों को बेरोजगारी की जमात में खड़ा करने के लिए उनके हाथ में सर्व शिक्षा अभियान का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है। और मैं बता दूं इस शैक्षणिक बीमारी का केवल एक कारण वो यह कि हमारे देश की शिक्षा नीति केवल दो तरह के लोगों के लिए बनती है, पहले वो जो विद्वान हैं और दूसरे वो जो धनवान हैं।

इसी तरह की कई गजब की बीमारियां हैं और इन बीमारियों की जो जड़ है ना, वो है हमारा अंधविश्वास। और मेरे विचारों में जब तक इस देश का युवा अपनी सफलता के लिए मंदिरों में जा-जाकर नारियल फोड़-फोड़कर भगवान को रिश्वत लगाता रहेगा, हमारे समाज का शिक्षित वर्ग ही बिल्ली के रास्ता काटने पर खड़े हो जाना, अपने धर्म, अपनी जाति को ऊंचा मानकर दूसरों के धर्म की अवहेलना करता रहेगा, तब तक ना तो इस देश से अंधविश्वास खत्म होगा और ना ही हमारा राष्ट्र निर्माण संभव होगा। हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता को दुनिया ने शीष नवाया है, तो क्यों आस्था के नाम पर हमने अंधविश्वास फैलाया है?

मेरे विचारों में हमारा राष्ट्र निर्माण तब संभव होगा जब इस देश में महिलाओं की पूजा नहीं उनकी इज्जत की जाएगी। राष्ट्र निर्माण तब संभव होगा जब हम जाति का रक्षण नहीं बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण पर बात करेंगे। राष्ट्र निर्माण तब संभव होगा जब स्वच्छता अभियान में केवल सरकार नहीं बल्कि सड़क पर चलने वाला हर एक नागरिक हाथ बटाएगा, स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत को दिल से अपनाएगा। असल मायने में हमारा राष्ट्र निर्माण तब संभव होगा जब एक गरीब बच्चा मध्याह्न भोजन के नहीं बल्कि ज्ञान अर्जन के लिए सरकारी स्कूल की चौखट पर कदम रखेगा।

और हमारा राष्ट्र निर्माण तब तक संभव नहीं होगा जब तक एक नागरिक नैतिक रूप से सड़ा, चारित्रिक रूप से भ्रष्ट, मानसिक रूप से दिवालिया, धार्मिक रूप से अंधा, राजनैतिक रूप से गंदा, स्वैच्छिक मान मूल्यों के आंकड़ों में छिन्न-भिन्न, अखंड भारत को खंड-खंड करता रहेगा, तब तक हमारा राष्ट्र निर्माण संभव नहीं होगा। बड़ी-बड़ी बातें नहीं छोटी-छोटी कोशिशें करनी होगी क्योंकि ठोकर हमें पहाड़ से नहीं पत्थरों से लगा करती है।

I being an Indian, I being a student, I being a simple daughter of this motherland, feel proud to be an Indian.

और मैं सैल्यूट करना चाहूंगी सरहद पर दिन रात हमारी रक्षा के लिए खड़े हर उस जवान को, इस देश की पुलिस, प्रशासन और किसान को, और इस देश के हर उस व्यक्ति को जो अपना काम पूरी ईमानदारी, पूरी मेहनत और पूरी लगन से करते हैं, जिनके बिना राष्ट्र निर्माण की कल्पना करना भी असंभव सा लगता है।

और आज इस मंच पर पूरी जिम्मेदारी के साथ मैं भारत की बेटी यह कहती हूं कि हमारा राष्ट्र निर्माण तब संभव होगा जब हम सभी, मैं, आप, हम सब मिलकर प्रयास करेंगे। क्योंकि हमारे देश की जिम्मेदारी नहीं है हमें आगे ले जाने की, हमारी जिम्मेदारी है अपने देश को आगे ले जाने की, अपने राष्ट्र को आगे ले जाने की, अपने वतन को आगे ले जाने की।

तो अंत में मैं बस यही कहना चाहूंगी…

शायरी 

मेरा हिंदुस्तान महान था, महान है, महान रहेगा। मेरा हिंदुस्तान महान था, महान है, महान रहेगा। होगा हौसला सबके दिलों में बुलंद, तो एक दिन पाकिस्तान भी जय हिंद कहेगा, पाकिस्तान ही क्यों सारा जहान जय हिंद कहेगा।

क्योंकि… सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा, यह गुलिस्तां हमारा।

जय हिंद, वंदे मातरम!

 

इसके बारे में भी जानें 

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युवा आपद मित्र 

 

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